दिल्ली 2020 की असली साज़िश: जानिए वो, जिसे पुलिस ने अनदेखा किया

विशेष: साल 2020 के दिल्ली दंगों को लेकर द वायर की श्रृंखला के पहले हिस्से में जानिए उन हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं को, जिन्होंने नफ़रत फ़ैलाने, भीड़ जुटाने और फिर हिंसा भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

रागिनी तिवारी, दीपक सिंह हिंदू और अंकित तिवारी.

रागिनी तिवारी, दीपक सिंह हिंदू और अंकित तिवारी.

नई दिल्ली: उस बात को एक साल बीत गया है जब दिल्ली में 53 लोगों को क्रूरता से मार दिया गया था, सैकड़ों घरों और दुकानों को तोड़ दिया गया था और सार्वजनिक संपत्ति को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंक दिया गया.

ऐसी हिंसा की जांच एक पेशेवर जांच एजेंसी को कैसे करनी चाहिए? आदर्श तौर पर पहले वह उन लोगों की पहचान करेगी जिन्होंने हिंसा में भाग लिया, फिर उन लोगों का पता लगाएगी जिन्होंने हिंसा के लिए भीड़ को जमा किया और उसे भड़काया.

वह छोटे छोटे बिंदुओं को ध्यान से जोड़कर एक साफ खाका तैयार करेगी. मगर यह काम करने के बजाय दिल्ली पुलिस पिछले दस महीनों से एक काल्पनिक षड्यंत्र का पीछा कर रही है.

इस सांप्रदायिक हिंसा के तार नए नागरिकता कानून (सीएए) का विरोध करने वालों से जोड़ने की आतुरता में पुलिस ने दावा किया कि कथित षड्यंत्र सीएए के खिलाफ़ हुए आंदोलन के दौरान दिसंबर में हुई छुटपुट हिंसा की घटनाओं से जुड़े हुए हैं.

मगर एड़ी-चोटी का जोर लगा देने के बावजूद दिल्ली पुलिस कथित मुख्य साज़िशकर्ताओं के तौर पर गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं- उमर खालिद, नताशा नरवाल, इशरत जहां, सफूरा जरगर, देवांगना कलीता, खालिद सैफी, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान- का इस हिंसा से सीधे तौर पर कोई संबंध नहीं जोड़ पाई है.

द वायर  ने पिछले कुछ महीने वह काम करते हुए बिताए हैं, जो शायद दिल्ली पुलिस ने नहीं किया या करना जरूरी नहीं समझा.

हमने सबूतों के तौर पर अज्ञात गवाहों के खोखले बयान, पुलिस हिरासत में लिए गए सवालिया कबूलनामे और तार्किकता से परे इल्जामों का सहारा नहीं लिया है बल्कि उन वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट्स और बयानों का इस्तेमाल किया है जो इन हिंदूवादी कार्यकर्ताओं ने स्वयं साझा किए हैं और इनसे जो तस्वीर उभरकर आई है, वह काफी भयावह है.

हमने सामने दिख रहे छोटे-छोटे बिंदु, जो दंगाइयों द्वारा डाली गई वीडियो में मौजूद हैं, से से शुरुआत की. इसके बाद हमने इनके पीछे जाकर देखा कि आखिर ये कौन लोग हैं, इन्हें किसने इतना कट्टर बनाया और कैसे ये लोग सड़कों पर गोलियों, तलवारों, पत्थरों, लाठियों और लोहे की रॉड के साथ उतर आए.

इन बिंदुओं को जोड़ने के बाद यह काफी साफ हो गया कि इस सांप्रदायिक दंगे के पीछे केवल किसी एक भाजपा नेता के किसी एक भड़काऊ भाषण का हाथ नहीं है, बल्कि इसकी तैयारी कई लोग दिसंबर 2019 के तीसरे हफ्ते से खुलेआम कर रहे थे. हिंसा की इस चिंगारी को मुख्यधारा में नेताओं ने कथित फ्रिंज तत्वों के साथ मिलकर और उनके समर्थक मीडिया की मदद से भड़काए रखा.

द वायर की ‘क्रोनोलॉजी’ इस हिंसा के पीछे छिपी असली साज़िश को बिल्कुल साफ कर देती है. जिन चेहरों और किरदारों को हम आज दिखाएंगे, इन्हें जानबूझकर दिल्ली पुलिस द्वारा जांच से बचाकर रखा गया, यहां तक कि इनका जिक्र भी नहीं हुआ. पर अब वो खामोशी टूटेगी.

जिसे पुलिस ने देखकर अनदेखा किया

फरवरी 2020 के आखिरी हफ्ते में दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा से झुलस गई थी. 1984 के सिख दंगों के बाद पहली बार राजधानी में ऐसी हिंसा हुई. इस बार हिंसा का स्तर छोटा था और इस हिंसा में सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों ने झेला.

2020 दो वजहों से 84 जैसा था. पहला, पुलिस ने पीड़ितों को बचाने की कोई कोशिश नहीं की. दूसरा, सत्ता दल से जुड़े नेताओं ने नफरत फैलाने और हिंसा भड़काने में अहम भूमिका निभाई.

इस संयोजित हिंसा के असली स्वरूप से ध्यान हटाने और अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए इस हिंसा का आरोप दिल्ली पुलिस ने सीएए का विरोध कर रहे मुस्लिम और प्रगतिशील सामाजिक कार्यकर्ताओं पर लगाया है. दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है, जिसका जिम्मा पूर्व भाजपा अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह के पास है.

24 फरवरी 2020 को मौजपुर क्रासिंग पर उपद्रवी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

24 फरवरी 2020 को मौजपुर क्रासिंग पर उपद्रवी. (फाइल फोटो: पीटीआई)

पिछले एक साल में दर्जनों दंगाइयों को गिरफ्तार किया गया है, लेकिन पुलिस ने जोर देकर कहा कि हिंसा को शुरू करने की वास्तविक साजिश सीएए के विरोध करने वालों की करतूत थी. देश के कठोर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत एक दर्जन से अधिक कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाए गए हैं.

एक मोटी चार्जशीट में पुलिस का दावा है कि इन कार्यकर्ताओं ने दुनिया की नजरों में नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम करने और फिर इसे जड़ से उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान दंगों को भड़काने की साजिश रची थी.

पर क्या पुलिस की जांच सही दिशा में जा रही है? या फिर पुलिस सामने दिख रहे असली षड्यंत्र को छोड़कर एक कपोल-कल्पना का पीछा कर रही है?

अपनी एक चार्जशीट में पुलिस ने दावा किया था कि ट्रंप की यात्रा के दौरान दंगों भड़काने की साज़िश 8 जनवरी, 2020 को की गई थी, जबकि इस दिन तक ट्रंप की यात्रा की को लेकर न भारत न ही अमेरिका ने कोई आधिकारिक घोषणा की थी.

यहां तक कि जब पुलिस सीएए विरोधी कार्यकर्ताओं के खिलाफ़ एक अविश्वसनीय साजिश की कहानी रच रही है, उसने जानबूझकर एक प्रभावशाली संगठन से जुड़े कुछ लोगों की जांच नहीं की, जो दिसंबर 2019 के तीसरे सप्ताह से सरेआम हिंसा से शांतिपूर्ण सीएए विरोधी प्रदर्शन को खत्म करने की वकालत कर रहे थे.

यह समूह प्रभावशाली इसलिए था क्योंकि इसका सीधा संबंध सत्ताधारी लोगों से है. इनका व्यापक उद्देश्य उन विरोधों को समाप्त करना था जो मोदी सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी का एक सबब बने थे और उन सभी को सबक सिखाना जिन्होंने इसमें हिस्सा लिया था, विशेष रूप से मुसलमानों और छात्रों को.

सांप्रदायिक हिंसा के पहले के हफ्तों में इनका साफ संदेश यह था कि सरकार के हिंदुत्व के एजेंडा का विरोध करने के लिए प्रदर्शनकारियों को एक बड़ी कीमत चुकानी होगी.

पुलिस ने इस समूह की जांच करने से इनकार कर दिया क्योंकि ये सभी एक ही हिंदुत्व ‘इकोसिस्टम’ का हिस्सा हैं, जो खुलेआम आपराधिक तत्वों (जिन्हें कभी-कभी गलत तरीके से ‘फ्रिंज’ कहा जाता है) से लेकर भाजपा नेताओं और मोदी सरकार के मंत्रियों तक फैला हुआ है.

जब द वायर  ने भाजपा नेता कपिल मिश्रा से जामिया, जेएनयू और एएमयू छात्रों को गोली मारने के नारे लगाने के बारे में पूछा, तो उन्होंने पहले इस बात से इनकार किया. लेकिन जब  उन्हें उनके वीडियो दिखाए गए, तो उन्होंने कहा कि ‘गोली मारो *** को’ कहना कोई बड़ी बात नहीं थी और शूटिंग का यह संदर्भ केवल एक तुकबंदी थी.

इसी तरह मिश्रा ने इस बात का भी खंडन  किया था कि मौजपुर में 23 फरवरी, 2020 की उनकी स्पीच में किसी प्रकार की हिंसक धमकी दी थी.

पिछले साल, दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर अजय राज शर्मा ने द वायर  से बातचीत में कहा था कि अगर वह पुलिस प्रभारी होते तो उन्होंने कपिल मिश्रा को गिरफ्तार कर लिया होता और पुलिसकर्मी होने के बावजूद मिश्रा की भड़काऊ टिप्पणी को चुपचाप सुनते हुए खड़े वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को भी निलंबित कर दिया होता.

हालांकि सरेआम हिंसा को अंजाम देने के लिए काम कर रहे भाजपा नेता और हिंदुत्व समूहों के लोगों के नाम किनारे करने के उत्साह में पुलिस जांचकर्ताओं ने मिश्रा के ‘शांतिपूर्ण इरादे वाले’ दावों को न केवल स्वीकार किया है, बल्कि उन सबूतों को भी नजरअंदाज कर दिया, जो सार्वजनिक तौर पर मौजूद थे और इन लोगों की साजिश की ओर इशारा कर रहे थे.

रागिनी तिवारी.

रागिनी तिवारी.

दिल्ली दंगों के दौरान भड़काऊ भाषण देने और हिंसा करने के लिए सुर्खियों में आईं कट्टर हिंदूवादी नेता रागिनी तिवारी ने दो महीने पहले जारी किए गए एक चौंकाने वाले वीडियो में दिल्ली के पास प्रदर्शनकारी किसानों पर हिंसा करने की धमकी दी. यह ठीक वैसा ही था जैसा उन्होंने सीएए के विरोध के समय मौजपुर में कहा था. दिसंबर में जारी वीडियो में वे कहती दिखती हैं:

‘अगर 16 (दिसंबर) तक किसानों का प्रदर्शन खत्म नहीं होता है तो 17 (दिसंबर) को एक और जाफराबाद होगा और रागिनी तिवारी खुद सड़कें खाली कराएंगी. जो भी होगा वो केंद्र सरकार, राज्य सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी होगी.’

रागिनी अपने इस वीडियो में जो कह रही हैं, यही तो कपिल मिश्रा ने 23 फरवरी 2020 को कहा था, जिसे रागिनी जैसे हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं ने मौजपुर, जाफराबाद और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई हिस्सों में अंजाम दिया और अब रागिनी ‘दूसरा जाफराबाद’ दोहराने की बात कह रही थीं.

कई लेख और वीडियो की इस श्रृंखला में द वायर  कई हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं और नेताओं से रूबरू करवाएगा, जिन्होंने नफरत फैलाने, भीड़ जुटाने और फिर हिंसा भड़काने में प्रमुख भूमिका निभाई. उनमें से कुछ की पहचान हम कर सके हैं, लेकिन अन्य अब भी गुमनाम हैं.

रागिनी तिवारी जैसे कार्यकर्ताओं ने वीडियो पर अपनी हिंसा में भूमिका का बार-बार दावा किया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने इस भीषण हिंसा, जिसने एक पुलिसकर्मी सहित 53 निर्दोष लोगों की जान ले ली, उनकी भूमिका के लिए उन पर मुकदमा चलाने का कोई प्रयास नहीं किया.

इस श्रृंखला के पहले भाग में हम दो ऐसे किरदारों- दीपक सिंह हिंदू और अंकित तिवारी की भूमिका पर बात करेंगे.

दीपक सिंह हिंदू, ‘हिंदू फोर्स’ का संस्थापक

23 फरवरी, 2020 की सुबह- जिस दिन कपिल मिश्रा ने उत्तर पूर्वी दिल्ली के मौजपुर चौक पर अपना ‘कुख्यात’ भाषण दिया था, दीपक सिंह हिंदू उस दिन भीड़ जुटाने के लिए फेसबुक पर वीडियो बना रहे थे:

लड़ने को तो ये लड़ाई अकेला ही लड़ रहा हूं लेकिन आज जो लड़ाई है, आज जो धर्मयुद्ध है उसमें मुझे आपका साथ चाहिए साथियों. सारी दिल्ली को शाहीन बाग बनाया जा रहा है साथियों.

उसी कड़ी में नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के जाफराबाद को भी शाहीन बाग बना दिया गया है. हजारों की संख्या में जिहादी मानसिकता के लोग सड़कों पर उतर आए हैं. पर हिजड़ों की तरह देखने से अच्छा है मर्दों की तरह मरना. और मैं दीपक सिंह हिंदू, आज इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाकर रहूंगा.

जरूर पहुंचे 2:30 बजे मौजपुर चौक… क्योंकि अगर दीपक सिंह हिंदू वहां अकेला पहुंचता है तो,  वो आप के लिए शर्म से डूब मरने की बात है. मेरी अपील है कि बड़ी से बड़ी संख्या में मौजपुर चौक पहुंचें. मेरा नंबर लें और कॉल करें. [नंबर बताते हैं]

मैं अपने समर्थकों के साथ वहां रहूंगा, हालांकि अगर आपका साथ मिला तो मेरी ताकत हजार गुना बढ़ जाएगी.’

दीपक सिंह हिंदू.

दीपक सिंह हिंदू.

हिंसा की सुबह रिकॉर्ड किए गए दीपक के इस भड़काऊ वीडियो को अगर दोबारा अच्छी तरह देखें, तो मालूम चलता लगता है कि उस समय तक किसी भी तरह की कोई भी हिंसा नहीं हुई थी.

दीपक सिंह हिंदू लोगों से मौजपुर चौक पर दोपहर ढाई बजे इकट्ठा होने के लिए कहते हैं. दोपहर 2:30 बजे ही क्यों? क्या उन्हें पता था कि कपिल मिश्रा भी उसी समय वहां आने की योजना बना रहे थे?

इसके पीछे किसका हाथ छिपा है जिसने हिंसा को शुरू करने के लिए उकसा रही भीड़ के जमावड़े के लिए यह समय और स्थान तय किया था? दिल्ली पुलिस ने इस बुनियादी सवाल को पूछने की जहमत क्यों नहीं उठाई?

पुलिस का दावा है कि सीएए कार्यकर्ताओं ने हिंसा को भड़काने के लिए साजिशन मौजपुर चौक के पास सड़क को अवरुद्ध किया था. तो क्या दीपक इस साजिश का हिस्सा था?

अगर उसने बड़ी संख्या में लोगों को जमा होने का आह्वान नहीं दिया होता, तब भी क्या फिर हिंसा होती? पुलिस ने उस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की है?

रागिनी तिवारी, भाजपा नेता गिरिराज सिंह और सुब्रमण्यम स्वामी के साथ दीपक. (क्लॉकवाइज़)

रागिनी तिवारी, भाजपा नेता गिरिराज सिंह,यती नरसिंहानंद और सुब्रमण्यम स्वामी के साथ दीपक. (क्लॉकवाइज़)

विडंबना ये है कि दिल्ली पुलिस की जांच तब आधार खो देती है जब हम देखते हैं कि 22 फरवरी 2020 को मौजपुर चौक पर  सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के जाफराबाद मेट्रो स्टेशन ब्लॉक करने से पहले ही दीपक सिंह हिंदू और अन्य कार्यकर्ताओं ने हिंसा भड़काने की योजना शुरू कर दी थी. पुलिस के अनुसार स्टेशन का ब्लॉक होना ही दंगे भड़कने की शुरुआत थी और फिर जो हुआ, उसके लिए सीएए विरोधी प्रदर्शनकारी जिम्मेदार थे.

लेकिन 23 जनवरी 2020 को, मेट्रो स्टेशन पर किसी भी तरह के प्रदर्शन से एक महीने पहले दीपक सिंह हिंदू ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को
हिंसा की चेतावनी दी थी:

मैं वो हूं जो शाहीन बाग भी जाता है, जेएनयू भी जाता है, जामिया भी जाता है और तुम्हारी हज़ारों की भीड़ में अकेला दहाड़कर आता है. अगर तू देशभक्त होता तो तू देश का बंटवारा मज़हब के आधार पर न होने देता. तुम इस देश का बंटवारा नहीं होने देते. तुम देशभक्त नहीं हो सुअरों. तुम केवल गद्दार गद्दार गद्दार हो और गद्दारों को केवल जूते मारे जाते हैं. और तुम्हें अब जूते मारे जाएंगे, इस बात को लिख लो, सुअरों.

भाजपा यह दिखावा करती है कि दीपक सिंह हिंदू जैसे लोग किसी प्रकार के फ्रिंज तत्व हैं. पर तथ्य यह है कि यह कथित फ्रिंज वही कह रहे थे जो पार्टी के वरिष्ठ नेता जैसे प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर – जो मोदी सरकार में मंत्री हैं – जनवरी के अंत में दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार में कह रहे थे.

जिस तरह से हिंदुत्व इकोसिस्टम काम करता है  वोकि इन चरमपंथी तत्वों के बीच निरंतर बातचीत होती है- मुख्यतया ऑनलाइन लेकिन निश्चित रूप से विरोध-प्रदर्शनों और सड़कों पर भी. यह तथाकथित ‘फ्रिंज’ नियमित रूप से भाजपा के कथित सम्मानजनक ‘मुख्यधारा’ के साथ बातचीत में रहता है.

मगर दीपक सिंह हिंदू उन कई हिंदुत्व कार्यकर्ताओं में से एक है जिनकी दिल्ली हिंसा में भूमिका पुलिस ने जानबूझकर अनदेखी की है, उसके जैसे कई और हैं.

अंकित तिवारी, भाजपा और आरएसएस कार्यकर्ता, कोंडली, दिल्ली

यदि भाजपा के कपिल मिश्रा ने इस असली साजिश के राजनीतिक चेहरे के रूप में कार्य किया और दीपक सिंह हिंदू ने उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में मौजपुर और अन्य स्थानों पर हिंसक भीड़ जुटाने में हिंदुत्व संगठनों की मदद की, तो अंकित तिवारी एक ज़मीनी सिपाही था, जिसे न केवल हिंसा करते देखा जा सकता है बल्कि वो मुसलमानों को मारने के लिए सोशल मीडिया पर खुलकर गर्व जाहिर भी करता है.

द वायर  ने तिवारी के सोशल मीडिया एकाउंट्स को अच्छी तरह से देखा. उसका एकाउंट मुसलमानों के खिलाफ़ हिंसक और नफरत भरी बातों से भरा हुआ है. वो आरएसएस से अपने संबंध का भी खुले तौर पर प्रचार करता है.

तिवारी को कई वीडियो क्लिप्स में हिंसा करते और भीड़ को उकसाते हुए देखा जा सकता है.

अंकित तिवारी. (फोटो साभार: इंस्टाग्राम)

अंकित तिवारी. (फोटो साभार: इंस्टाग्राम)

आज भी दर्जन भर से ज़्यादा सीएए विरोधी कार्यकर्ता जेल में बंद हैं, मगर अंकित दिल्ली की सड़कों पर आज़ाद घूम रहा है, बावजूद उन सबूतों के जो उसने स्वयं अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए हैं.

यह चिंताजनक है कि वो आज भी कई ज़हरीले वीडियो डालता रहता है और अपने सोशल मीडिया पर हिंसा की धमकियां देता है. 12 नवंबर को इंस्टाग्राम पर एक वीडियो पोस्ट में उसने सेना में भर्ती होकर कर कश्मीर के ‘कटुओं’ को मारने की बात कही है.

पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में द वायर  के रिपोर्टर्स ने इंस्टाग्राम पर उससे एक महिला के नाम से बातचीत की. इस चैट में उसने कई मुसलमानों को मारने काटने का दावा किया.

अंकित तिवारी ने बताया कि एक रात वह भी मौजपुर गया था. ‘हम सब राष्ट्रवादी दोस्त थे. हमारे पास हथियार थे.’

उसने यह दावा भी किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने हमले के लिए जॉइंट टीम बनाई थीं. उसने ‘कोड लैंग्वेज’ में मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा में शामिल होने और ‘बराबर प्रसाद बांटने’ की बात भी कबूली.

एक दूसरी इंस्टाग्राम स्टोरी में तिवारी कई ‘कटुओं’ और मुल्लों को काटने का दावा भी करता है. दीपक की ही तरह तिवारी भी अकेला नहीं है, बल्कि वह हिंसक चरमपंथियों के एक बड़े गिरोह का छोटा-सा हिस्सा है.

अपनी एक चैट में उसने कहा कि वह सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे जामिया के छात्रों पर 30 जनवरी 2020 को गोली चलाने वाले ‘राम भक्त’ गोपाल को भी जानता है.

तिवारी ने यह भी बताया कि उसने 20 दिसंबर 2019 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा कनॉट प्लेस पर आयोजित सीएए समर्थन रैली में भाग लिया था, जहां भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने सीएए के समर्थन में नारेबाजी की थी.

उसने दिल्ली में हुई गृह मंत्री अमित शाह की एक चुनावी रैली का वीडियो भी अपने इंस्टाग्राम पर साझा किया था.

अंकित तिवारी का इंस्टाग्राम एकाउंट.

अंकित तिवारी का इंस्टाग्राम एकाउंट.

उसने बिना किसी डर के यह भयानक दावा भी किया कि कैसे वह और उसके साथी फिर से दंगे करने की प्लानिंग कर रहे हैं और इसकी सारी तैयारियां हो चुकी हैं. उसका यह भी दावा है कि जब दिल्ली में एनआरसी लागू होगा, फिर से एक बार सांप्रदायिक दंगे होंगे.

दिल्ली 2020 की असली साजिश श्रृंखला के दूसरे भाग में हम दिल्ली के हिंदुत्व नेटवर्क के चार और किरदारों के बारे में बताएंगे और दिखाएंगे कि ये लोग और इनका सांप्रदायिक ज़हर, न सिर्फ दिल्ली के लिए बल्कि पूरे भारत के लिए, सत्ता दल के एक बड़े राजनीतिक प्रोजेक्ट का हिस्सा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)



source http://thewirehindi.com/161048/delhi-2020-the-real-conspiracy-what-the-police-chose-not-to-see/?utm_source=rss&utm_medium=rss&utm_campaign=delhi-2020-the-real-conspiracy-what-the-police-chose-not-to-see

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