नए संसद के निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा परियोजना को दी हरी झंडी

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत के फैसले में कहा कि सेंट्रल विस्टा परियोजना के लिए जो पर्यावरण मंज़ूरी दी गई है तथा भूमि उपयोग में परिवर्तन के लिए जो अधिसूचना जारी की गई है, वे वैध हैं.

(फोटो साभार: एचसीपी डिजाइंस)

(फोटो साभार: एचसीपी डिजाइंस)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए सेंट्रल विस्टा परियोजना की खातिर पर्यावरण मंजूरी और भूमि उपयोग में बदलाव की अधिसूचना को बरकरार रखा और इसके साथ परियोजना को हरी झंडी दे दी.

जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत के फैसले में कहा कि परियोजना के लिए जो पर्यावरण मंजूरी दी गई है तथा भूमि उपयोग में परिवर्तन के लिए जो अधिसूचना जारी की गई है, वे वैध हैं.

जस्टिस खानविलकर ने खुद तथा जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की ओर से बहुमत वाला फैसला लिखा, जिसमें सेंट्रल विस्टा परियोजना के प्रस्तावक को सभी निर्माण स्थलों पर स्मॉग टॉवर लगाने और एंटी-स्मॉग गन का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया है.

रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने लिखा, ‘हम मानते हैं कि डीडीए (दिल्ली विकास प्राधिकरण) अधिनियम के तहत केंद्र सरकार की कवायद कानूनी और वैध है और लागू अधिसूचना की पुष्टि की गई है. पर्यावरण समिति की सिफारिश कानूनी है और (हम) उसी को बरकरार रखते हैं.’

पीठ के तीसरे न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने भी परियोजना को मंजूरी पर सहमति जताई, हालांकि उन्होंने भूमि उपयोग में बदलाव संबंधी फैसले पर और परियोजना को पर्यावरण मंजूरी दिए जाने पर असहमति जताई.

उन्होंने अल्पमत वाले फैसले में लिखा, ‘विरासत संरक्षण समिति की कोई पूर्व स्वीकृति नहीं थी और इस तरह मामले को जनसुनवाई के लिए वापस भेज दिया गया. पर्यावरण मंजूरी के पहलू पर, यह कारण न बताने वाला आदेश था.’

परियोजना के खिलाफ दाखिल अनेक याचिकाओं पर शीर्ष अदालत का यह फैसला आया है, जिनमें परियोजना को दी गई विभिन्न मंजूरियों पर आपत्ति जताई गई है, इनमें पर्यावरण मंजूरी दिए जाने और भूमि उपयोग के बदलाव की मंजूरी देने का भी विरोध किया गया है.

इससे पहले सात दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर हुई पिछली सुनवाई में काम शुरू न करने की शर्त पर सरकार को ‘सेंट्रल विस्टा परियोजना’ के शिलान्यास करने की मंजूरी दी थी.

इसके बाद 10 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद भवन की नई इमारत की आधारशिला रखी थी.

इस परियोजना की घोषणा पिछले वर्ष सितंबर में हुई थी, जिसमें एक नए त्रिभुजाकार संसद भवन का निर्माण किया जाना है. इसके निर्माण का लक्ष्य अगस्त 2022 तक है, जब देश स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा. इस परियोजना के तहत साझा केंद्रीय सचिवालय 2024 तक बनने का अनुमान है.

यह योजना लुटियंस दिल्ली में राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक तीन किलोमीटर लंबे दायरे में फैली हुई है. केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) के मुताबिक नई इमारत संसद भवन संपदा की प्लॉट संख्या 118 पर बनेगी.

नई इमारत में ज्यादा सांसदों के लिए जगह होगी, क्योंकि परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों की संख्या बढ़ सकती है. इसमें करीब 1400 सांसदों के बैठने की जगह होगी. लोकसभा के लिए 888 (वर्तमान में 543) और राज्यसभा के लिए 384 ( वर्तमान में 245) सीट होगी.

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा था कि सेंट्रल विस्टा परियोजना के लिए जमीनी स्तर पर किसी प्रकार का बदलाव प्राधिकारी अपने जोखिम पर करेंगे. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि इस परियोजना का भविष्य उसके फैसले पर निर्भर करेगा.

इस मामले में सुनवाई के दौरान केंद्र ने न्यायालय में तर्क दिया था कि परियोजना से उस ‘धन की बचत’ होगी, जिसका भुगतान राष्ट्रीय राजधानी में केंद्र सरकार के मंत्रालयों के लिए किराये पर परिसर लेने के लिए किया जाता है.

केंद्र ने यह भी कहा था कि नए संसद भवन का निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया गया और परियोजना के लिए किसी भी तरह से किसी भी नियम या कानून का कोई उल्लंघन नहीं किया गया.

केंद्र ने परियोजना के लिए सलाहकार का चयन करने में कोई मनमानी या पक्षपात करने से इनकार करते हुए कहा था कि सिर्फ इस दलील पर परियोजना को रद्द नहीं किया जा सकता कि सरकार इसके लिए बेहतर प्रक्रिया अपना सकती थी.

गुजरात स्थित आर्किटेक्चर कंपनी ‘एचसीपी डिज़ाइंस’ ने ‘सेंट्रल विस्टा’ के पुनर्विकास के लिए परियोजना के लिए परामर्शी बोली जीती है.

बता दें कि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय की विशेष मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने 22 अप्रैल को मौजूदा संसद भवन के विस्तार और नवीकरण को पर्यावरण मंजूरी देने की सिफारिश की थी.

इसके बाद देश के 60 पूर्व नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर केंद्र की सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना पर चिंता व्यक्त की थी. उन्होंने कहा था कि ऐसे वक्त में जब जन स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के लिए भारी भरकम धनराशि की जरूरत है तब यह कदम ‘गैर-जिम्मेदारी’ भरा है.

इससे पहले एक याचिका में सेंट्रल विस्टा परियोजना के लिए निर्धारित लैंड यूज को चुनौती दी गई थी, इसमें आरोप लगाया था कि इस काम के लिए लुटियंस जोन की 86 एकड़ भूमि इस्तेमाल होने वाली है और इसके चलते लोगों के खुले में घूमने का क्षेत्र और हरियाली खत्म हो जाएगी.

याचिका में ये दलील दी गई थी कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा 19 दिसंबर 2019 को जारी किए गए पब्लिक नोटिस को अमान्य करार देने के लिए सरकार द्वारा 20 मार्च 2020 को जारी किया गया नोटिफिकेशन कानून और न्यायिक प्रोटोकॉल के नियम का दमन है, क्योंकि 2019 वाले नोटिस को चुनौती दी गई है और खुद सुप्रीम कोर्ट इसकी सुनवाई कर रहा है.

हालांकि मई महीने में शीर्ष अदालत ने इस प्रोजेक्ट पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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