गरीब वाे है, जिसके पास न तो सपने हैं और न अभिलाषा-स्वामी िववेकानंद

'' मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।'' 11 सितंबर, 1893 को दिया स्वामी विवेकानंद का यह प्रसिद्ध 'शिकागो भाषण' आज भी प्रासंगिक है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उन्हें याद करते हुए कहा था, '' स्वामी विवेकानंद करोड़ों भारतीयों के दिल और दिमाग में रहते हैं, विशेष रूप से भारत के गतिशील युवा जिनके लिए उनकी एक भव्य दृष्टि है।''

 

शिकागो में दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में स्वामी विवेकानंद दुनिया को हिंदू धर्म, उसकी परंपरा और सभ्यता से परिचित कराया। उनके इस भाषण ने भारत के बारे में दुनिया के सोचने का तरीका ही बदल दिया। इतिहास के पन्नों में अमर हुए स्वामी विवेकानंद के इस भाषण को 11 सितंबर को 127 साल पूरे हुए हैं।

शिकागो में स्वामी विवेकानंद ने जैसे ही अपने संबोधन की शुरूआत में कहा- 'मेरे अमेिरकी भाईयों एवं बहनों', वहां उपस्थित लोगों ने खड़े होकर उनका अिभवादन िकया। स्वामी िववेकानंद ने अपने संबोधन में कहा था,'' मुझे गर्व हैकि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं। मैं इस मौके पर वह पंक्तियां सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद की और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं। जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलगअलग रास्ते चुनता है। ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं।''


 िशकागो धर्म संसद के दौरान उन्होंने अपनी प्रत्येक यात्रा के दौरान जो कुछ भी देखा उसे अपने भाषण में शामिल िकया और वापस आने के बाद उन्होंने युवाओं और समाज के िलए बहुत सराहनीय काम िकए। स्वामी िववेकानंद का दृष्टिकोण भारत और भारत के युवाओं के िलए िबल्कुल आधुिनक था। एक बार जब एक युवक ने स्वामी िववेकांदन से आग्रह िकया िक वो उसे श्रीमद् भागवद् गीता का ज्ञान करा दें तो उन्होंने उस युवक को परामर्शदिया कि पहले छह महीने वह फुटबॉल खेले और अपनी क्षमता के अनुसार गरीबों और असहायों की सहायता करे फिर वह उसे गीता का ज्ञान प्रदान करेंगे। 


स्वामी िववेकानंद के शब्दों में ''आप अपने भाग्य िनर्माता है। िजसके पास एक भी रूपया नहीं है वह गरीब नहीं है, गरीब तो वह हैिजसके पास न तो सपने हैं और न अिभलाषा।'' स्वामी विवेकानंद 19 वीं सदी के योगी रामकृष्ण परमहंस के प्रिय शिष्य थे। उन्होंने रामकषृ्ण मठ की स्थापना की। रामकषृ्ण मठ दुनिया भर में आध्यात्मिक आंदोलन के िलए रामकृष्ण मिशन के रूप में जाना जाता है, इस मठ का आधार वेदांत का प्राचीन हिंदू दर्शन है।

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